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प्राइवेट हॉस्पिटलों में इलाज की पारदर्शिता के लिए सेबी जैसा नियामक की है जरूरत

प्राइवेट हॉस्पिटलों में इलाज की पारदर्शिता के लिए सेबी जैसा नियामक की है जरूरत
श्रीगंगानगर।
भारत में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र, विशेषकर निजी अस्पतालों में बढ़ती अनियमितताओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इन पर नियंत्रण के लिए सेबी जैसा स्वतंत्र और सशक्त नियामक स्थापित किया जाना चाहिए। बीते कुछ वर्षों में अस्पतालों द्वारा दवाइयों और सर्जिकल उपकरणों पर एमआरपी से कई गुना ज्यादा कीमत वसूलने, ओवर बिलिंग और पारदर्शिता की कमी जैसे गंभीर मामले सामने आए हैं। मरीजों को अक्सर मजबूर किया जाता हैं कि वे केवल अस्पताल के फार्मेसी से दवाइयां और उपकरण खरीदे, जो बाजार कीमत से कई गुना अधिक महंगे होते हैं। एंटी-कैंसर दवाइयों और स्टेंट जैसे जीवन रक्षक उत्पादों की कीमत में 4 से 5 गुना का अंतर एक आम मरीज के लिए भारी आर्थिक बोझ बन जाता है।
इसके अलावा, अस्पतालों की बिलिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव हैं। मरीजों और उनके परिजनों को यह जानकारी नहीं दी जाती कि जिन दवाइयों और सेवाओं के लिए भारी कीमत वसूली जा रही है, उनकी वास्तविक लागत कितनी है।कई बार दवाइयों की पैकेजिंग पर एमआरपी, आयातक का नाम और ग्राहक सेवा नंबर जैसे अनिवार्य विवरण तक नहीं होते। ऐसे में यह स्पष्ट हैं कि मौजूदा नियम और विनियम स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में पारदर्शिता लाने में असमर्थ रहे हैं।सेबी जैसे स्वतंत्र नियामक की आवश्यकता इसलिए भी महसूस होती है क्योंकि यह न केवल अस्पतालों को जवाबदेह बना सकता है, बल्कि मरीजों के अधिकारों की रक्षा भी कर सकता है। एक नियामक के माध्यम से अस्पतालों के बिलिंग सिस्टम का नियमित ऑडिट किया जा सकता है, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी। यह मरीजों को यह अधिकार भी देगा कि वे अपनी दवाइयां किसी भी प्रमाणित मेडिकल स्टोर से खरीद सके, जिससे अस्पताल की मनमानी खत्म होगी।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एफडीए और एनएचएस जैसे मॉडल मौजूद हैं। भारत में भी ऐसा मॉडल अपनाकर मरीजों और अस्पतालों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। स्वास्थ्य सेवा को व्यापार नहीं, सेवा के रूप में देखते हुए यह समय की मांग हैं कि सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए।

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