बहुचर्चित फिजियोथैरेपी इक्विपमेंट खरीद घोटाले में सीएमएचओ डा. अजय सिंगला के विरुद्ध केस दर्ज
– विभागीय जांच में डॉ. अजय सिंगला ही दोषी पाए गए थे
श्रीगंगानगर। श्रीगंगानगर जिले में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा 2016-17 में सरकारी अस्पतालों के लिए फिजोथेरेपी इक्विपमेंट खरीद में लगभग 39 लाख के उजागर हुए फर्जीवाड़े एवं गबन-घोटाले के बहुचर्चित मामले में आखिरकार डॉ. अजय सिंगला तथा एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ अदालत के आदेश पर कोतवाली में पद के दुरुपयोग, धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी कागजातबनाने का मामला दर्ज हो गया। डॉ अजय सिंगला वर्तमान में श्री गंगानगर में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) के पद परज्ञहैं। मुकदमे में एक अन्य व्यक्ति नवल योगी नामजद है।
सीएमएचओ ऑफिस में अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी धीरज गहलोत द्वारा अदालत में दायर किए गए इस्तगासा के आधार पर धारा 166, 420, 468, 471 और 120-बी में दर्ज किए मुकदमे की जांच एएसआई कृष्णचंद्र सिहाग के सुपुर्द की गई है।इसमें पद का दुरुपयोग कर फर्जी बिल बनाकर सरकारी कोष लगभग 39 लाख रुपए के गबन का इल्जाम लगाया गया है। पूर्व में इस मामले को लेकर हुई शिकायतों पर विभागीय जांच करवाई गई थी, जिसमें डॉ. अजय सिंगला वह अन्य को दोषी माना गया था। धीरज गहलोत ने विगत नवंबर माह के अंतिम सप्ताह में कोतवाली में इस मामले को लेकर परिवाद दिया था। पुलिस ने तब बिना मुकदमा दर्ज किया जांच शुरू की। पुलिस द्वारा सीएमएचओ ऑफिस से इस घोटाले से संबंधित रिकार्ड मांगा गया जो कि उसे नहीं मिला। इसी बीच धीरज गहलोत ने अदालत में इस्तगासा से दायर कर दिया, जिसके आधार पर अब मुकदमा दर्ज हुआ है। दो वर्ष पहले तत्कालीन अतिरिक्त जिला कलेक्टर (सतर्कता) उम्मेदसिंह ने तत्कालीन सीएमएचओ को मुकदमा दर्ज करवाने के निर्देश दिए थे, लेकिन मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, क्योंकि अधिकारियों ने पुलिस को पूरा विवरण दिया ही नहीं था। मामले के अनुसार वर्ष 2016-17 के दौरान एनपीएचसी कार्यक्रम के तहत जिले के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में बुजुर्गों के लिए फिजियोथैरेपी इक्विपमेंट की खरीद की जानी थी। उस समय डॉ. अजय सिंगला उप मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (स्वास्थ्य) के पद पर थे। उनकी देखरेख और सुपरविजन में इक्विपमेंट्स की खरीद की गई,जिसमें बड़े पैमाने पर फर्जी दस्तावेज बनाए गए। बगैर आईएसआई मार्का के घटिया किस्म इक्विपमेंट की खरीद की गई, जिसका भुगतान 38 लाख 88 हजार 700 रुपए का किया गया। खरीदे उपकरण बहुत ही घटिया निकले। उनका सरकारी अस्पतालों में इंस्टॉलेशन भी नहीं किया गया। फिर भी भुगतान कर दिया गया।
एडीएम के आदेश पर भी दर्ज नहीं हुआ मुकदमा
इस मामले में खास बात यह है कि 31 अक्टूबर 2022 को तत्कालीन अतिरिक्त जिला कलेक्टर (सतर्कता)एवं प्रभारी अधिकारी विकास शाखा कलेक्ट्रेट उम्मेदसिंह ने और 7 नवंबर 2022 को तथा जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने उस समय के सीएमएचओ को बाकायदा लिखित में मुकदमा दर्ज करवाने के लिए निर्देशित किया था। सीएमएचओ ने इस प्रकरण में मुकदमा दर्ज करने के लिए कोतवाली में प्रार्थना पत्र भी दिया। तत्कालीन थाना प्रभारी ने इस पर विवरण बनाकर लाने के लिए सीएमएचओ को जवाबी पत्र प्रेषित कर दिया ताकि मुकदमा दर्ज किया जा सके, लेकिन विभागीय अधिकारियों की लिप्तता होने के कारण पुलिस को विवरण प्रस्तुत ही नहीं किया गया।
फर्जी कंपनी और फर्जी बिल
आरोप है कि इक्विपमेंट खरीदने के लिए केंद्र सरकार के उपक्रम डायरेक्टरेट जनरल आफ सप्लाई एंड डिस्पोजल (डीजीएस एंड डी) के फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। ब्रान क्लिप हेल्थ केयर प्राइवेट लिमिटेड के नाम से दिल्ली के पते पर एक फर्जी कंपनी बनाई गई। डीजीएस एंड डी के कूटरचित रेट कॉन्ट्रैक्ट और इंस्पेक्शन नोट भी बनाए गए। फर्जी नोट शीट चलाई गई।खरीद प्रक्रिया में डॉ. अजय सिंगल ने फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों को असल के रूप में उच्च अधिकारियों को प्रेषित कर उनका अनुमोदन प्राप्त किया। फिर 13 अक्टूबर 2016 को डॉ. सिंगला की अध्यक्षता में तकनीकी समिति का गठन हुआ। एमसीडी के प्रभारी होने के नाते डॉ. सिंगला की जिम्मेदारी थी कि वे दस्तावेजों की पूरी तरह से जांच करने के बाद उच्च अधिकारियों को भेजते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कभी भी कागजातों का समानांतरण सत्यापन नहीं करवाया। उनके द्वारा भेजे गए फर्जी दस्तावेजों को उच्च अधिकारियों ने सत्य मानते हुए उपकरणों की खरीद की। परिवाद के मुताबिक खरीदे के इक्विपमेंट्स की उप मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के एनसीडी स्टोर में एंट्री की गई। स्टोर के वाउचर द्वारा सरकारी अस्पतालों को यह इक्विपमेंट वितरित किए गए। इसका भुगतान दिल्ली की फर्म की बजाय श्रीगंगानगर में इंडियन ओवरसीज बैंक के एक अकाउंट में किया गया। इस मामले में सीएमएचओ ऑफिस में एनसीडी शाखा में एफसीएलसी नवल योगी के भी बहुत संदिग्ध भूमिका रही। विभागीय जांच में करीब 39 लाख का गबन तथा सरकारी कोष को नुकसान पहुंचाना माना जा चुका है। मामला राज्य विधानसभा में भी उठ चुका है। सबसे पहले यह मामला जिला परिषद में डायरेक्टर दुलीचंद मेघवाल ने उठाया,जिस पर प्रशासन ने जांच के आदेश दिए।
